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12 August 2015

मुझको तेरा गुमाँ ..........


क्यूँ   धुआँ है  समाँ 
 मुझको  तेरा गुमाँ  
होंठ चुप है और  आँखे 
कर रही है बयाँ 


जब से पाया मैंने तुझको, 
हुआ  है  कुछ मुझे  ,
ज़मीन पे अब नहीं हूँ मैं 
पा  लिया  जब तुझे, 
बाँहों में आ   थाम  ले अब तो 
 मुझे  ऐ आसमाँ !


हवा सी अल्हड भोली मैं 
खुश्बू की हूँ  डली  
शाख़ पर खिल उठे जैसे  
 फूल की वो कली 
महकाऊँगी  चार सू  मैं 
और तेरा जहाँ 

चाँद भी रात भर  मुझको 
एकटक देखा  करे 
ख्वाब की सिम्फनी  हरपल 
 नींद में गूँजा करे 
ख़्वाहिशों  के सब मुसाफिर अब 
ठौर पाए   कहाँ  


ऐ समुन्दर अपने अंदर तू 
अब  समा  ले मुझको 
 रेत सा साहिलों  पे अब 
तू बिछा दे मुझको  
छोड़ जाऊँगी ज़माने में 
अपने बाक़ी  निशाँ 




22 July 2015

तू मुझी में रह गया



सोचती  हूँ 
अक्सर जब भी 
समुन्दर के किनारे 
भीगती हूँ कहीं -

ये   वक़्त  हुआ कुछ लहरों सा
जाने कहाँ,  कितना  बह गया !!
किसी कारवां साथ  मेरा छोड़, कहीं दूर,
बहुत दूर  चल दिया 


न जाने क्यों , 
तू  जो ज़रा सा,
मुझमे   कहीं  था
शायद तू 
मुझी में   वहीँ  पर रह गया     !  !

ख्वाब



मेरे ख्वाबो के दरीचों से कुछ.
ख्वाब तुम भी चुन लो ना !
बेरंग से,  हुए कुछ ख्वाब ,
इनमे , रंग तुम भी भर दो ना।


बेघर है, आवारा है,  
कुछ ख्वाब मेरी रातो के।
मेरे ख्वाबो को एक बार
फिर जीने की वजह दो ना

टूटी हुए काँचो से ये
पलकों में चुभते है।
रिसते हुए इन ख्वाबो पे
मरहम तो लगा दो ना।


बारिश की बूंदो से 
साहिलों की रेतो से 
आओ अपने हाथो में तुम 
ख्वाब ये सजा लो न  








10 July 2015

तू है, मेरा ख़ुदा


मेरी सहर तू, 
रब की मेहर तू , 
तू  है, मेरा ख़ुदा ! 
हाँ, .... मेरा ख़ुदा !

बादलो में  सुर्ख़ सूरज
यूँ है  लिपटा  हुआ,
तेरी पलकों में जहां ये
ज्यूँ है सिमटा हुआ।  

काली रातो के रँगो में 
ये चाँद है जो,  रंगा हुआ,  
चाँद  की वो, बिंदी वाली
तू है  सुनहरी, वो सुबह।

इस फलक से औ' ज़मीन से 
 है तू  सबसे जुदा 
रब से जो, मांगी थी मैंने , 
तू  है,  वो  दुआ। 



8 July 2015

हर हसीं शाम के बाद, एक रात हुई



 हर हसीं शाम के बाद,  एक रात हुई
हर मुलाकात के बाद, तेरी ही बात हुई।

माना के तेरे दर पे, न चर्चे मेरे होंगे, 
मेरे दर पे हर एक बार तेरी ही बात हुई।

देख ली मैंने भी खुशियाँ,  ज़माने भर की
ज़िन्दगी ये  तो खुशनुमा बस,  तेरे ही साथ हुई।