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17 August 2015

आई है भोर


उठा  कैसा शोर, पूरब की ओर , 
मन में हिलोर लिए, आई है भोर। 

नभ में उड़े पंछी अपार,
करते है  कलरव, बार बार। 

कल कल बहे झरने हज़ार ,
ज्यूँ बह रही हो गंगधार। 

तरूवर की देखो , लंबी कतार,
 कुछ देवदार कुछ है चनार। 

पहने हुए फूलो का हार,
करे भोर देखो सिंदूरी श्रंगार। 

 उमड़ा है फिर  ऋतुओ का प्यार,
बन  बूँदो की  रिमझिम फुहार। 


हर भोर  जैसै कोई    त्योहार 
लाये  ये  रोज़  खुशियाँ अपार !! 

23 July 2015

वो चाँद



शाम आई दबे पाँव जब तो 
खुश हो गया वो चाँद 
आसमां  के माथे पे बिंदी सा 
सज गया वो चाँद। 

काली रातों  की  सियाही में 
कहीं  खोने  लगा वो चाँद,
होने को आई जब  सहर तो, 
 बेज़ार, रोने लगा वो चाँद

अपने अश्क़ो  से ज़मी को
भिगोने लगा वो चाँद। 
दिन ने दिनभर उसको मनाया, 
तो दिन में  फिर सो गया वो चाँद। 

7 July 2015

बादल



आसमा में बादलो  ने  हमेशा
कैसे कैसे गुल खिलाये
पेड़ पंछी और  धरा को  न जाने ये कितना सतायें ।


काले काले कपडे पहनकर
दामिनी संग झूम झूमकर
 पींगे पींगे ले , सावन के गीत गाये।

कभी गुस्से में होके  लाल पीले
यूँ गरजकर और  बरसकर
नदी  नाले झरने सागर में ये पूर लाये  ।

पेड़ो की शाखों में फंसकर
तो कभी पर्वतो पे चढ़कर
पंछियों सा शोर  कितना ये  मचाये।

चाँद को भी घेर ले ये
सूरज को भी उगने न दे ये
कई बार दिन में रात दिखाए।


दिन सहम जाये कभी तो
रात डर से थरथराए
डरा के दोनों को फिर ये देखो कैसे   खिलखिलाए


मुंडेर पे  बैठी हवा के
कानो में क्या ये बुदबुदाये
बावरी  होकर हवा फिर  मीलो तलक इसको  भगाए।


ऐ बादलो क्यूँ  हमसे रूठे ?
इस बरस  तुम क्यों  न लौटे  ?
आ जाओ !  सब है बैठे तेरी  राह में पलके बिछाये।