27 April 2026

ख़्वाब ख़लिश और ख्वाहिश मैं




 ख्वाब ख़लिश और ख्वाहिश मैं 

सदियों की सिफारिश मैं 

जो लम्हों ने सदियों से की है

वक्त की वो हूं साज़िश मैं 

ख्वाब ख़लिश और ख्वाहिश मैं 


दिल पे पत्थर कौन  धरे 

होंठ ये  क्योंकर मौन रहे 

खामोशी के  मेले में 

शोर  की  हूं  फरमाइश मैं


इंतजार के पल न ढले 

उमर ये बैठी हाथ मले 

ग़म के अंधेरे से मांगी

खुशियों की गुंजाइश मैं 


प्यार सभी को कब है मिले

हिज़्र से वस्ल ये न संभले 

इश्क़ प्यार और प्रेम की लेकिन 

जिंदा एक नुमाइश मैं 






1 comment:

Admin said...

आपने जिस तरह भाव और विचार को साथ रखा, वो पढ़ते हुए धीरे-धीरे असर करता है। मुझे इसमें कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखी, बल्कि एक ठहराव दिखा जो हर लाइन को वजन देता है। आपने सीधे जवाब देने के बजाय सोचने की जगह छोड़ी, और यही इसे खास बनाता है।