30 April 2026

सांसे गिनती रहती हूं

  



दुनिया से कुछ भी

कहती नहीं मैं 

ख़ुद की भी अब

सुनती नहीं मैं 

गुमसुम गुमसुम 

चुप चुप सी मैं 

खामोशी से 

सन्नाटे बुनती रहती हूं 



उम्र को कौन

खिजाब  लगाए ?

सुख दुख के क्यों 

 हिसाब लगाए?

दुख तो मय का 

पैमाना है

मैं मय खाने में 

रहती हूं 


किसका अब तो 

नाम पुकारे 

किसका रस्ता 

नैन निहारे 

गुम से रस्ते 

गुम सी मंज़िल 

हमनवा को तरसती 

 रहती  हूं 


ख्वाहिश ने भी अब 

दामन ये छोड़ा 

सपनों ने भी अब 

नाता ये तोड़ा 

आस नहीं है

आभास नहीं है

थोड़ी थोड़ी 

जो भी बची है

सांसे गिनती रहती हूं





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