दुनिया से कुछ भी
कहती नहीं मैं
ख़ुद की भी अब
सुनती नहीं मैं
गुमसुम गुमसुम
चुप चुप सी मैं
खामोशी से
सन्नाटे बुनती रहती हूं
उम्र को कौन
खिजाब लगाए ?
सुख दुख के क्यों
हिसाब लगाए?
दुख तो मय का
पैमाना है
मैं मय खाने में
रहती हूं
किसका अब तो
नाम पुकारे
किसका रस्ता
नैन निहारे
गुम से रस्ते
गुम सी मंज़िल
हमनवा को तरसती
रहती हूं
ख्वाहिश ने भी अब
दामन ये छोड़ा
सपनों ने भी अब
नाता ये तोड़ा
आस नहीं है
आभास नहीं है
थोड़ी थोड़ी
जो भी बची है
सांसे गिनती रहती हूं

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