ख्वाब ख़लिश और ख्वाहिश मैं
सदियों की सिफारिश मैं
जो लम्हों ने सदियों से की है
वक्त की वो हूं साज़िश मैं
ख्वाब ख़लिश और ख्वाहिश मैं
दिल पे पत्थर कौन धरे
होंठ ये क्योंकर मौन रहे
खामोशी के मेले में
शोर की हूं फरमाइश मैं
इंतजार के पल न ढले
उमर ये बैठी हाथ मले
ग़म के अंधेरे से मांगी
खुशियों की गुंजाइश मैं
प्यार सभी को कब है मिले
हिज़्र से वस्ल ये न संभले
इश्क़ प्यार और प्रेम की लेकिन
जिंदा एक नुमाइश मैं

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