11 July 2017

मुनासिब नहीं हैं

न चाहूँ तुझे मैं 
ये वाजिब नहीं है 
मिले चाँद सबको 
मुनासिब नहीं है 

हुए रेत से ख़्वाब 
कब कैसे क्या जाने 
पलकों से फिसलें
ये दिल की माने 
कहे चाँद ये तो 
मुनासिब नहीं है  

हुए जिस्म साये 
कब कैसे क्या जाने 
कब साथ छोड़े 
कब कौन जाने 
सुनो चाँद ये तो 
मुनासिब नहीं है 

न चाहूँ तुझे मैं 
ये वाजिब नहीं है 
मिले चाँद सबको 
मुनासिब नहीं है