4 October 2016

Icecream


"इरा  - तेरे पापा के  केस की तारीख ५  की आई  है" - मम्मी का फ़ोन आया था। 
" हां,  तो ?"
" अरे,  हमारा रिजर्वेशन है न सूरत से जामनगर  का-  ४ को !" मम्मी बोली थी। 
पापा इन दिनों हमारे खेत के केस के सिलसिले में आमला  गए हुए थे और अचानक केस की डेट आ गई थी। 
पापा मम्मी और इरा  १० साल की बेटी - तीनो १० दिनों के लिए इरा की  बहन के घर   जामनगर जा रहे थे। कुल मिला कर अब इरा के  पापा इस सफर पे साथ नहीं होने वाले थे। 

मम्मी परेशां थी - ज़ाहिर था !  ट्रेन  रात १. ३० बजे चलती थी।  हालाँकि ,गुजरात में महिला सुरक्षा कोई मसला नहीं है -मगर उनके घुटने में दिक्कत होने के कारण वो चिंतित थी। 

"कोई बात नहीं मैं चलती हूँ अहमदाबाद तक फिर लौट आउंगी तुरंत " इरा ने  कहा।  और आनन् फानन में आने जाने का रिजर्वेशन करवा लिया था।

वो  तीनो - दो माएँ  और दो बेटियां निकल पड़े थे अपने सफर पर। 

दिक्कत तो  इरा   को थी!   रात १. ३० बजे निकलना - ५. ३५ सुबह पहुचना और फिर सुबह ६ बजे की वापसी की ट्रैन लेकर वापस आना और कॉलेज attend करना। 

खैर all said and done  , इरा सुबह अहमदबाद प्लेटफार्म  नंबर एक पर उतरी और भागते हुए साँतवे  प्लेटफार्म से अपनी वापसी की ट्रेन  पकड़ने चल पड़ी। 

ट्रेन खड़ी थी - इरा की  जान में जान आई।  बहुत थक गई थी इरा ।  सोचा बैठने से पहले एक चाय पि ली जाय और पानी खरीद लिया जाय।

एक स्टॉल पर पहुंची।  पानी लिया और चाय भी।  

तभी वहां एक आदमी - दुबला पतला सा करीब २७ -३० साल का रहा होगा, आया ।  उसके साथ में शायद दो ढाई साल की एक बेटी थी और पाँच -छह साल का लड़का था। हाथ में दस रूपए का नोट था।  
उस स्टॉल पर वाडीलाल आइसक्रीम भी बिक रही थी।  बेटी छोटी सी उचक उचक कर कह रही थी - पप्पा आइसक्रीम , आइसक्रीम ! बेटा  थोड़ा लंबा था सो रखी हुई आइसक्रीम को   देख पा  था।  उसने भी अपने पापा का हाथ पकड़ा और एक आतुर नज़रो अपने पिता को  देखा मानो कह रहा हो - पप्पा मुझे भी चाहिए!

उस आदमी ने दस का नोट दिखाया और कहा ," दस वाळी  कोइक आइसक्रीम  आपी दो। "  (कोई दस रूपए की आइसक्रीम दे दो ) 

स्टॉल वाला बोला , "दस वाळी  कोई आइसक्रीम  नथी , आवतीज नथी "  (दस वाली कोई आइसक्रीम नहीं है - आती ही नहीं है"

उस आदमीं के चेहरे पर एक भाव आया - चला गया। इरा वही खड़ी हुई चाय पी रही थी - देख रही थी सब कुछ।  

आदमी ने फिर कहा - "जुओ  न , हसे  कोइक !" (देखो न , होगी कोई !)

"में किदू  ने- आवतीज नथी !" (मैंने कहा न - आती ही नहीं )

छोटी बच्ची अब भी उचक उचक कर कह रही थी - "पप्पा -आइसक्रीम !!

"कई नई - मने  कोइक चाकलेट आपी दो - दस वाळी", वो बोला। 

इरा आगे आई, बोली- " भइया,  इन्हें दो आइसक्रीम दे दो " 

स्टॉल वाला और वो आदमी दोनों इरा को देखने लगे। उस आदमी के चेहरे पर कुछ भाव उभरे - इरा ने देखा और फिर स्टॉल वाले से बोली , " कितने की है भइया ?" 
"तीस रूपए की " 

" दे दो और  ये लो पैसे " और तीस  रूपए पकड़ते हुए बोली इरा। 

उस आदमी के चेहरे पर भाव थे - उसका स्वाभिमान उसे लेने से रोक रहा था और साथ में थे वो दोनों बच्चे  आइसक्रीम की आस लगाए !

अजीब लग रहा  था शायद उसे - कोई अजनबी औरत क्यूँ उसके बच्चे के लिए आइसक्रीम खरीद के दे रही थी। 

इरा ने बच्चो को देख  पलके झपकाई और सर झुकाया मानो कह रही  हो -"ले लो "

स्टॉल वाला दोनों को देख रहा था।  उस आदमी के हाथ में अब भी दस का नोट था। 
हाँ -असमंजस में था वो।  शायद  सोच रहा था  वो  की  - इस महिला  से - अरे , किसी से भी भीख  क्यों ले  ? कैसे ले ? 
वो नहीं लेना चाहता था किसी भी सूरत में नहीं।  लेकिन वो बँट सा गया था - ममता और स्वाभिमान के बीच। 

स्टॉल वाला बहुत समझदार निकला।  इरा को दस का एक नोट लौटते हुए बोला -" मैडम १० रूपए इन से ले लेता हूँ।  "

वाकई शायद सबसे अच्छा solution था - बच्चो को आइसक्रीम भी मिल गई थी और उस आदमी को अपना स्वाभिमान भी।  
अपनी कोच की ओर  जाती इरा ने बेंच पर बैठे उस  आदमी  को देखा।  वह अपने बच्चे और पत्नी के साथ बैठा था - बच्चे  ख़ुशी से आइसक्रीम रहे थे।  उस आदमी की नज़रे इरा से मिली - उसकी नज़रो में अजब सा भाव था - इरा ने उसे पढ़ने की कोशिश नहीं की और अपनी सीट पर जाकर बैठ गई - उसे आगे लंबे सफर पर भी तो जाना था - बहुत थक भी तो गई थी वो !