जाने देना...
जैसे पेड़ों से हो कहना ,
कि तोड़ दे वो
सूखी शाखें
गिरा दे वो
पीले सूखे भूरे पत्ते
पतझड़ के आ जाने पे
जाने देना...
जैसे बहती हवाओं से
हो कहना
भूल जाएं वो साँस लेना
जाने देना...
जैसे अम्बर से कहना हो,
कि भूल जाए उस ज़मीं को जो उसके तले है!
मगर फिर भी... जाने देना ही तो है,
ज़िंदगी को यह मौक़ा देना कि वह—
नूतन हो सके,
पुनर्जीवित हो सके,
पुनर्जन्म ले सके,
और नव-सृजित हो सके!
तो आओ...
अब जाने भी दो,
No comments:
Post a Comment