लगा मुझे क्यों
इक नज़र में
दिल को तेरे
मैं भा गई
लगा मुझको
जैसे नींदों में
हिचकी यादों की
तुझको जगा गई
उस गली के मोड़ पर
उस फलक के छोर पर
प्रीत की लाली खिली
तारों हर सूं सजा गई
फूल कोई खिला चमन में
पंछी जैसे उड़े ग़गन में
कली इशक की
बागों में मेरे खिला गई
इशक का काजल लगा लूं
नाम होंठों पर सजा लूं
नाम तेरा नजरें तेरी
जिस्म को धड़का गई
तू जहां है मैं वहीं हूं
तू नहीं तो मैं नहीं हूं
तेरा होना मेरा होना
क़यामत मुझे समझा गई
लगा मुझको
जैसे नींदों में
हिचकी यादों की
तुझको जगा गई
क्यों...
है न?

No comments:
Post a Comment