11 April 2026

डाकिया

  

शहर में तेरे 

डाकिया बाबू 

क्या अब भी  वो आता है ?

पहुंचाने चिट्ठी हर, बाबू 

गली गली  क्या जाता है ?


क्योंकि

 मैने नाम पे तेरे 

भर रक्खे है कागज़ कोरे 

कुछ कागज पे आंसू गिरे  है

कुछ कागज़ पे दर्द लिखें है 

इक कागज़ पे नाम लिखा है 

जिसमें दिल का हाल लिखा है 

पूछा है कब आओगे तुम 

मुझको कब ले जाओगे  तुम 

सुनो ओ सजना मेरे बलमा

अब के मुझमें 

मुझ से  मिलना


जब मिलो तो  तुम 

इतना बस कर दो

सारा फलक 

आंखों में धर दो 

चंदा  को पिघला के धर दो

 झांझर  बूंदे  उसके गढ़ा दो ।

पायल भी पैरों की  बनवा दो 


शाम  सुनहरी धूप रुपहली 

 ऐसी  इक चोली सिला दो

फूलों का लहंगा बनवा दो 

तारों की झालर लगवा  दो 

चुनर में किरणें जड़वा दो


रात अगर जो  स्याही  दे दे

काजल सा उसको सजवा दो

रात रानी का गुच्छा हो तो

 वेणी  में उसको गूंधवा दो 



मैं फिर तुमसे तुममें मिलूंगी 

इंद्रधनुष के रंग बुनूंगी 

तेरी रग रग में  यूं घुलूँगी 

मीठी अगन सी तुझ में जलूँगी 

इत्र सी सांसों में महकूंगी 

कि तुम  तो मेरे राजा हो ना 

रानी हूं मैं रानी रहूंगी 

मैं तेरी होके तेरी रहूंगी 

तेरी होके तेरी रहूंगी 



पर दशकों की देर हो गई 

उन सुबह की भोर हो गई 

अब कोई न खत ये पढ़ेगा 

टूटा जो ये भोर का तारा 

ताउम्र बस खुद में जलेगा 

ताउम्र बस खुद में चलेगा 







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