आहिस्ता बोलिये कहीं
सुन ले n ये फ़िराक़ ए दिल
धड़केगा ज़ोर ज़ोर से
संभलेगा न फ़िर जनाब दिल
तुमसे ये नज़रें क्यूँ
उलझती रहीं है
गुत्थी है क्या ये
सुलझती नहीं है
रिश्तों के धागे है
दिल ने जो बाँधे है
आहिस्ता खोलिए इन्हें
कि बिखरे न ये फिराक दिल
धड़केगा ज़ोर ज़ोर से
संभलेगा न फ़िर जनाब दिल
ग़ज़लें और नज्में तुम
लिखते रहे हो
किस्से कहानी तुम
गढ़ते रहे हो
लफ़्ज़ों की काया है
इनकी इक माया है
तोल के बोलिये इन्हें
टूटे न ले ये फिराक दिल
धड़केगा ज़ोर ज़ोर से
संभलेगा न फ़िर जनाब दिल

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