पथरीली राहों पे
निकल पड़ी मैं तो साथ तुम्हारे
मंज़िल मंज़िल मुझको पुकारे
मैं न सुनूँ मैं हूँ साथ तुम्हारे
अब मुझको हो फिकर ही कैसी
ग़म हो आखिर किस बात का
खुशियां है अब दामन में मेरे
उड़ती फिरूँ मैं साथ तुम्हारे
मंज़िल मंज़िल मुझको पुकारे
मैं न सुनूँ मैं हूँ साथ तुम्हारे
कोई सफ़र हो कोई डगर हो
धूप से अपना क्या वास्ता
छाँव छाँव राहें हैं मेरी
बादल पे है पाँव हमारे
मंज़िल मंज़िल मुझको पुकारे
मैं न सुनूँ मैं हूँ साथ तुम्हारे
कोई लम्हा सदियों सा होगा
या सदियां खुद लम्हे सी हो
हर लम्हा हर पल को जिऊं मैं
रुक गये जैसे वक़्त के धारे
मंज़िल मंज़िल मुझको पुकारे
मैं न सुनूँ मैं हूँ साथ तुम्हारे

No comments:
Post a Comment