वो जो टुकड़ा ,
अपनी ज़मीं का,
तूने मुझको दिया था ...
उस टुकड़े में
शाम ढले
इस रात की जानिब,
यादों के जंगल पलते है
बीती बातों के कुछ जुगनू
इस जंगल में बुझते जलते है
उस टुकड़े से जाने कैसे
लम्हा कोई
रिसता है
खंजर सा वो लम्हा
दिल में
आ कर चुभता है
टीस उठे और
पीड़ जगे
दिन ऐसे ये गुज़रते है
भूले वादों के कुछ जुगनू
इस जंगल में बुझते जलते है
उस टुकड़े से
गहरा हरा सा
और नीला रंग
टपकता है
पलकों पे रुक जाए
तो
कभी होंठों पे
ठहरता है
ज़ख्म हरा हो
या हो नीला
ज़ख्म कहां ये भरते है
शिकवों के कुछ जुगनू
इस जंगल में बुझते जलते है

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