29 January 2026

वो रिश्ता

 क्या तुम कभी 

मुझे पढ़ते हो 

शब्द मेरे मुझ से ही 

छोटे छोटे  

भारी भरकम 

गोल मटोल 

मगर कहीं कहीं खुरदुरे

कहीं रुखे 

कहीं  कहीं नुकीले से है 

चुभ जाते है कई बार 

अनजाने  में अनचाहे से


कभी तो 

मामूली खरोचें लग आती है

तो कभी 

थोड़ी सी चोट लग आती है

मगर इस बार शायद 

नश्तर ही चुभ गया था

घाव ज्यादा ही रिस गया था 

कोमा में ही चला गया वो रिश्ता 

आज भी परे हूं 

समझने से 

कि ये रिश्ता जिंदा है भी 

या मर गया बरसो पहले


और ढो रही हूं मैं 

एक मरघट 

अपने कांधे पे 

कि बस 

मुखाग्नि ही देनी है 

इस मरे हुए रिश्ते को 


पर जाने क्यों 

कभी रुक रुक 

नब्ज़ टटोलती हूं 

ये जानते हुए कि 

वो मर चुका है 

पर उसका क्या करूं 

जो मुझमें जिंदा है अभी !!

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