क्या तुम कभी
मुझे पढ़ते हो
शब्द मेरे मुझ से ही
छोटे छोटे
भारी भरकम
गोल मटोल
मगर कहीं कहीं खुरदुरे
कहीं रुखे
कहीं कहीं नुकीले से है
चुभ जाते है कई बार
अनजाने में अनचाहे से
कभी तो
मामूली खरोचें लग आती है
तो कभी
थोड़ी सी चोट लग आती है
मगर इस बार शायद
नश्तर ही चुभ गया था
घाव ज्यादा ही रिस गया था
कोमा में ही चला गया वो रिश्ता
आज भी परे हूं
समझने से
कि ये रिश्ता जिंदा है भी
या मर गया बरसो पहले
और ढो रही हूं मैं
एक मरघट
अपने कांधे पे
कि बस
मुखाग्नि ही देनी है
इस मरे हुए रिश्ते को
पर जाने क्यों
कभी रुक रुक
नब्ज़ टटोलती हूं
ये जानते हुए कि
वो मर चुका है
पर उसका क्या करूं
जो मुझमें जिंदा है अभी !!
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