बीता माघ और फागुन आया
होली का त्यौहार ले आया
रंगो से पिचकारी भर गई
बाल गोपाल की टोली सज गई
सरर सरर पिचकारी बोले
भीगे भीगे तन मन डोले
छेड़ रहे सब लोग लुगाई
मचा हुड़दंग कि होली आई
थाली में फिर गुझिया सज गई
खाने की एक होड़ सी लग गई
नीला लाल हरा रंग डाला
क्या जीजा क्या भाई का साला
कीचड़ से लथपथ दुई भाई
अम्मा रह गई देती दुहाई
डांट पड़ेगी , होगी धुनाई
कैसे होगी ये रंग धुलाई
डामर ग्रीस तेल और गोबर
पैठे नदिया पैठे पोखर
बाट जोहती बैठी वो पनघट
लटपट झटपट सुन रे नटखट
रंग दी बिट्टी की घोड़ा गाड़ी
बुक्के फाड़ वो रोई दहाड़ी
भात भात की रस्में निभाई
भूल दुश्मनी सब गले लगाई
समय बनाए कैसी रंगोली
जीवन भी सुख दुख की होली

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