11 June 2022

मन्नतें

 ख्वाहिशें तेरे दर पे आके 

रुक गई है 

मन्नतें तेरे दर पे आके 

झुक गई है 

अब यहां से मेरा

जाना होगा फिर कहां ?

तू मिरी तिशनगी

तू मिरी आवारगी

तू ही  हैं मेरी जन्नत

तू जहां 

तू है  जहां जहां 

मैं रहूंगी बस वहां  .....


रोक पाऊंगी दिल  में 

तुझ को कब तक

 मैं भला ?

 वक्त ठहरा कब कहां ,

 ये चला 

 वो तो हां चला ..

 

 इक एक पल मैं जोड़ लूं 

 पहनूं तुझको , ओढ़ लूं

 हर राह तुझपे

 मोड़ लूं 

अब तो आजा तू नज़र

जिस्मों जां में तू उतर 

 फिर राते हो या हो  सहर 

 कर मुझमें तू बसर 

 न रोक पाऊं ज्वार ये 

मैं,  जलजला

 भर दे मुझमें जो है,

 वो ख़ला ।

 तू है तो फ़िर किससे,

 क्यों  हो  अब गिला 

मैं बस  चलूं

जहां तू ले चला

कि अधूरा मैं हूं  तेरा 

सिलसिला 

  .....

6 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

जहाँ तू वहाँ सारा जहाँ मेरा ...... समर्पण को कहती अच्छी नज़्म ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

जहाँ तू वहाँ सारा जहाँ मेरा ...... समर्पण को कहती अच्छी नज़्म ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी लिखी रचना सोमवार 13 जून 2022 को
पांच लिंकों का आनंद पर... साझा की गई है
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

संगीता स्वरूप

Sweta sinha said...

बहुत सुंदर प्रेमाकुल अभिव्यक्ति।
सादर।

Sudha Devrani said...

वाह!!!
बहुत सुन्दर सृजन।

Sudha Devrani said...

वाह!!!
बहुत सुन्दर सृजन।