14 November 2021

कृष्णविवर

 प्रेम में टूटी स्त्री 

के भीतर

पनपने लगते है,

छोटे छोटे कृष्णविवर....

कुछ उसकी 

उदास आंखों में..

 कुछ उसकी खाली खोखली

आवाज़  में....

और कुछ

उसके  उदास और 

सूने अंतर्मन में भी ...


उसकी  अबोली वेदनाओं और 

पीड़ाओं से जन्मे 

ये निर्लिप्तता और खालीपन के 

गहन अंधेरें,

इन कृष्णविवरों को...

और विस्तार देते है 

जो बढ़ते जाते है 

अनंत की तरह,

अनंत  के साथ ...



फिर ...

दिन बीतते है 

बरसों बरस बीत जाते है ....

और ..…

एक दिन ....

प्रेम में टूटी हुई 

वो स्त्री ....

बिना कुछ कहे ...

 चुपचाप समा जाती है,

इन्ही कृष्णविवरों में .....सदेह  !!!!




1 comment:

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा said...

अत्यंत ही संवेदनशील व उत्कृष्ट रचना के सृजन हेतु साधुवाद आदरणीया।।।।