5 May 2020

मैं सोचूं रात भर

 मैं....
 सोचूं  रात भर 
 शाम ओ सहर
मुमकिन है क्या
तुम संग सफर 

मैं बादल हूं  तुम पे यूं मैं बरसूंगी
तुम पानी हो मछली बन मैं तरसूंगी
मैं बूंदों  की लहर 
होंठो पे ठहर 
गुनगुना मुझे जैसे 
गीत की बहर 


मैं मिट्टी हूं , मुठ्ठी से मैं फिसलूंगी
मैं खुशबू  हूं, हवाओं में मैं बिखरूंगी 
मैं गुजरी सहर 
लम्हों में मगर 
रुक जाऊंगी जैसे 
सदियों में पहर

1 comment:

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा said...

आपकी रचनाओं में एक सुरूर व ताजगी है।

आप मेरे ब्लॉग पर भी आए, स्वागत है आपका।