9 August 2016

अंधेरो से क्यूँ जाने सुलह न हुई



अंधेरो से क्यूँ  जाने सुलह न हुई इस दिन की फिर कोई सुबह न हुई हम सफ़र में रहे, हमसफ़र न हुए साथ चलते रहे पर कलह न हुई मिन्नते की बहुत, की बहुत आजिजी उम्र गुज़री पर उनसे सुलह न हुई थे हबीब हम तो  कैसे रक़ीब  हो  गए वक़्त गुज़रा है तुमसे  जिरह न हुई है ख़फ़ा ज़ि...