27 May 2016

हिस्सों में बँट गई क्यूँ ज़िंदगी बेवजह

हिस्सों में बँट गई क्यूँ ज़िंदगी बेवजह
क़िस्सों में बँट गई क्यूँ ज़िंदगी बेवजह

ख़ून था जो तेरा , ख़ून था वो मेरा
मँजहबो में बँट गई क्यूँ बंदगी बेवजह

एक ही ज़मीं थी था एक ही वो आसमां
सरहदों में बँट गई क्यूँ बाशिंदगी बेवजह

ढूँढते ही रहे हम आदमी को आदमी में
थोड़ी थोड़ी सब में बँट गई दरिंदगी बेवजह

प्यास थी पानियों की , लहू की क्यूँ हो गयी
बाग़ के हर फूल में बँट गई तिशनगि बेवजह