9 February 2016

पूछती हूँ




पूछती हूँ मैं अपने हर कदम से सदा
तुम वहाँ क्यूँ पड़े,  तुम जहाँ हो पड़े ?

थी कतारें वहाँ पर, ज़ख़्म ही ज़ख़्म की 
हम जहाँ, जिधर भी, जिसके द्वारें खड़े 

 किस्सा-ए-कहानी, ये  दुनिया नहीं  थी 
पर उखाड़े  है जब भी, निकले मुर्दे गड़े 

दुश्मनों की तो कोई कमी ही नहीं थी 
मिले दोस्त जो भी, वो थे सयाने  बड़े 


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