काश ! ए इंसान तू गधा होता !
न कोई नया इन्वेंशन बना होता !
न किताबो में उनके बारे में
भर भर के लिखा होता !
यु पढ़ने और पढ़ाने का
सिलसला ना चला होता !
काहे का इतिहास और
काहे को ये भूगोल हुआ होता ?
ना अंग्रेजी ना हिंदी का
झोलमझोळ हुआ होता !
ए बेमुर्रवत इंसान!! तू दूर
किसी खेत में चर रहा होता !!
न काटता तू पेड़ और पहाड़
और न नदिया गन्दी कर रहा होता
रहता तू भी जंगल में
और शेर भालू से डर रहा होता
होता गधा तो आज तू भी
कहीं ढेंचू -ढेंचू कर रहा होता
अरे जो हो कम से कम
पढ़ाई तो नहीं कर रहा होता !!
न कोई नया इन्वेंशन बना होता !
न किताबो में उनके बारे में
भर भर के लिखा होता !
यु पढ़ने और पढ़ाने का
सिलसला ना चला होता !
काहे का इतिहास और
काहे को ये भूगोल हुआ होता ?
ना अंग्रेजी ना हिंदी का
झोलमझोळ हुआ होता !
ए बेमुर्रवत इंसान!! तू दूर
किसी खेत में चर रहा होता !!
न काटता तू पेड़ और पहाड़
और न नदिया गन्दी कर रहा होता
रहता तू भी जंगल में
और शेर भालू से डर रहा होता
होता गधा तो आज तू भी
कहीं ढेंचू -ढेंचू कर रहा होता
अरे जो हो कम से कम
पढ़ाई तो नहीं कर रहा होता !!
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