हूं.. हूं... हूं
पानी पे कुछ लिखा है ...
लिखा जो
गर पढ़ लो तुम
तो जानोगे ......
मोहब्बत की ये
बात कैसी होती है ...
इस दिल में जो लगी है
वो आग कैसी होती है... हा हा...
हूं.. हूं... हूं
नदिया एक जुबानी है
वो कहती इक कहानी है
लहरों से जो बनी है
वो राग कैसी होती है
भंवरों की वो गुंजन
धुन विहाग जैसी होती है
हूं.. हूं... हूं
शामें तो निशानी है
हर रोज़ आनी जानी है
सिंदूरी से दिन रैन के
सुहाग जैसी होती है
धरती और अम्बर के
अनुराग जैसी होती है
हूं.. हूं... हूं
ये यादें तो पुरानी है
जो तुझको अब सुनानी है
ग़म की रातों के उजले
चिराग जैसी होती है
बांध रखे हमें एक दूजे से
ये ताग जैसी होती है
हूं हूं हूं
ये दिल की आग जैसी होती है
हूं.. हूं..
ये दिल के विराग जैसी होती है

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