बिखरा यहां हर सूं ....
कोहरा
बूझे बदन न कोई ....
चेहरा
एक सेर उदासी थी
कुछ तोले ग़म के थे
पर वक्त तराजू था
कहीं कुछ नहीं ठहरा
कुछ दूर थे सन्नाटे
आवाज़ भी गुम सी थी
क्यों कोई यहां सुनता
हर शख्स यहाँ बहरा
सूखा एक मन में था
सूखा ये तन भी था
हर आंख भी सूखी थी
सब ओर यहां सहरा
कहीं कोई वजह तो हो
है हार तो जीत भी हो
मनमीत कोई तो हो
न प्रीत पे हो पहरा

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