10 January 2016

ख़ामोशी कह रही है, कई अनसुनी है बाते




कुछ सुनी है मैंने , कुछ  अनसुनी है  बाते 
शामें भी अनमनी है, उलझी हुई   है   राते  

जुगनू भी थक गए  है  खुद  को यूँ जलाकर
 कैसे  भला  अंधेरो के उजालो से है ये नाते 

ऐ काश क़ि  समुन्दर होती मेरी हथेली 
लिखती मेरा मुक़द्दर लहरें यूँ  आते जाते 

मेरे आशियां  में आया, तू जलजला था कोई
ज़र्ज़र है अब  दीवारे, और  टूटे है ये  अहाते