वो बैठे वहां पर
होके निढाल
सोचा चलो
जाने उनका भी हाल
जाके देखा पास उनके
चेहरा पे पतझड़
फीलिंग्स पे उनकी
था आया खरमास
बिखरे से बाल
हाल बेहाल
थे बिल्ली से भीगे
ये माई के लाल
सकपकाए
हम बौखलाए
आखिर तो किसने
किया उनका
ऐसा ये हाल
उम्र उनकी
चौपन सी थी कुछ
जवानी में उनकी
रवानी बची थी कुछ
पूछा तो जाना
कोई फ्रॉड हुआ था
ऑनलाइन किसी से
उन्हें प्यार हुआ था
प्रोफाइल में थी वो
षोडशी सी कमसिन
साथ जीने की खा ली
कसमें भी एक दिन
आखिर मिलन का
दिन वो आया
रजिस्ट्रार ऑफिस में
मोहतरमा ने बुलाया
सूट बूट में सज्जित
केशो को रंग के
पहुंचे रजिस्ट्रार ऑफिस
सुनहरे ख्वाबों को संग ले
आतुर सी आंखों
से ऑफिस टटोला
कमसिन नहीं थी
वहां कोई बाला
अधेड़ सी वहां
एक स्त्री थी बैठी
साथ में उसके
चार बेटा बेटी
लपक के वो फिर
मोहतरमा आई
पलकें झुका वो
थोड़ा लजाई
बोली सुनो जी
चलो ब्याह कर ले
इन बालकों को
सनाथ कर दे
हक्के बक्के ये
जनाब रह गए
सुंदर महल वो
ख्वाबों के ढह गए
आंखों के आगे
अंधेरा सा छाया
सरपट भागे
जैसे भूत आया
डैडी डैडी की
बड़ी आवाजें आई
मोहतरमा ने भी
दी कितनी दुहाई
बच्चों के पप्पा
अरे ओ हरजाई
क्या तुझ को मैं अब
रास न आई
साहब से तब से ही
टूटे टूटे है
खुद ही खुद से वो
रूठे रूठे हैं
जान बातें ये सब
हमने पीटा माथा
ऑनलाइन से सुनो सब
सब तोड़ो ऐसा नाता
फंसना न तुम भी
जालों में ऐसे
लुट तो जाओगे तुम भी
इन जनाब जैसे
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