17 October 2025

बाँचती रही हूं मैं

 



बस तुम्हें औ तुम्हारा लिखा ही तो बाँचती रही हूं

तुम्हे मैं सोना चांदी हीरा मोती में ही तो आंकती रही हूं


तुम्हे अक्षरशः पढ़ना जैसे सांस सांस लेना

तेरा वजूद तूफान सा और मैं पत्ते सी कांपती रही हूं


एक मंज़र सा तू मिरी तलाश उम्र भर की

ढूंढने तुझे गली गली धूल फांकती रही हूं


बेहिस बेलिबास छलकते इस रूमानी  इश्क़ को 

कुछ लिहाज़ कुछ झिझक से ढांकती रही हूं 


सात आसमानों से परे उम्मीदों के  फ़लक पे

ख़्वाब मोती ताउम्र मैं  तो टांकती रही हूं 


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