3 September 2016

और साँझ ढल गई

"साँझ को  तो आना है और ढल जाना है, यही नियति है उसकी " - ये शब्द अब भी घूम  रहे थे समर के दिमाग  में !

सुन्न सा बैठा रह गया समर अपना मोबाइल लिए हुए।  यकीं नहीं  हो रहा था उसे कि   साँझ 'ढल ' गई थी हमेशा के लिए - कभी न आने के लिए - अंधेरो की गर्त में खो गई थी। हर रोज़ की तरह सुबह  तो आएगी, शाम भी आएगी लेकिन 'साँझ' फिर से अगले दिन का सवेरा बनकर कभी नहीं उगेगी - कभी नहीं!

नहीं , रूबरू तो कभी नहीं मिला था उससे - 'साँझ' से , कभी नहीं !  लेकिन लगता था जैसे सदियों से जानता था उसे ।

अभी कुछ ही महीनो पहले की तो बात है जब ट्विटर पर देखा था उसे  - अचानक किसी RT और conversation  का हिस्सा बनते बनते।

उसका असली नाम  भी  तो नहीं जानता था वो । हैंडल था @साँझ_सवेरे।  आये दिन तो अपना ट्विटर नाम बदलती रहती थी वो। कभी 'रेत ' , कभी 'साबिया',  कभी 'साँझ',  तो कभी 'sixteen_till _I _die" और न जाने क्या क्या !! हालाँकि समर  ने साँझ के  बहुत पुराने ट्वीट नहीं देखे थे  कभी।
अक्सर उसकी dp (प्रोफाइल पिक्चर) भी बदलती रहती - मसलन, कभी ढलती शामें , कभी सहरा , कभी कभार खुद की फोटो डाल  देती थी।  बड़ी dicy  थी - शायद fickle minded  भी।   कभी कभी अचानक ट्विटर अकाउंट डीएक्टिवेट कर देती ,फिर पता नहीं अचानक  थोड़ी देर या फिर थोड़े   दिनों में क्यूँ एक्टिव हो जाती थी ।

समर को लगा था पहले कि  शायद कम उम्र की होगी 'साँझ'  ! मगर फिर बाद में पता चला वो तो   लड़की या युवती नहीं थी, उम्रदराज़ थी , करीब ४०-४५  बरस की।  मगर ट्वीट्स से तो कभी लगा ही नहीं।  समर  से  तो तीन चार साल ही बड़ी  थी साँझ !

कभी जाने इतनी फ़लसफ़े की बाते लिखती और कभी ऐसी चुलबुली बाते , अल्हड सी जैसे शायद एक सोलह साल की लड़की। हाँ, शायद इसलिए  वो लिखती थी -"sixteen_till _I _die!"

 किसी भी अकाउंट से गपियाने लगती कभी और कभी पता नहीं क्या होता की धमकी दे देती TL  की आपको ब्लॉक कर दूंगी वगैरह वगैरह ! सोचता था समर - क्या उसको समझ नहीं आता कि  और भी लोग ये  सब उसकी अनर्गल बाते पढ़ रहे है - शायद हंस रहे होंगे या कुछ कहते होंगे आपस में।  मगर साँझ को  कहाँ कोई फ़र्क़ पड़ा कभी !

कविताये लिखती थी साँझ, ग़ज़ल लिखने की अधूरी सी कोशिश मगर कभी कभी कुछ अच्छा भी लिख देती थी।
कभी रात  १२  -१ बजे लिखती रहती - बतियाती रहती किसी से भी   तो कभी  दिन दिन  भर कुछ भी नहीं  !

यूँ  तो बहुत सारे हैंडल ऐसे होते है - मगर वो  थोड़ी अलग थी !
उसके fewliners  - यही कहती थी अपने १४० characters  वाले ट्वीट्स को कई बार को  - उनमें कुछ था ऐसा जो समर से कहीं connect  करता था।   समर को लगता वो जानता है इस साँझ को - हालाँकि  चेहरा अनजान है मगर - ये जो रूह है - उसे कहीं मिला है समर !कहीं तो  जुड़ा है समर !   कुछ तो   था जो बरबस वो साँझ की ट्वीट्स बार बार पढता !

प्यार तो नहीं था - हो भी नहीं सकता था !!!
समर का अपना  प्यार था - ऊष्मा!   उसकी संगी , उसकी साथी, उसकी जीवन संगिनी और उसकी प्यारी सी बिटिया की माँ थी -  ऊष्मा ! ऊष्मा -  जिसे वो बेपनाह चाहता था, जिससे  प्रेम विवाह किया था उसने।  तो  प्यार तो कभी वो किसी और से कर ही नहीं सकता था सिवाय  ऊष्मा के !

नहीं, ये प्यार तो हो ही नहीं सकता था  !! और दूसरे , ये ट्विटर वर्ल्ड था यहाँ कितने fake  अकाउंट , id  -  असली  तो कुछ होता ही  नहीं था  यहाँ !!
सब अपनी अपनी वजह से आते है ट्विटर पर   मगर इस अकाउंट से @साँझ_सवेरे से कोई अलग सा नाता था उसका - शायद रूहानी  - नहीं, पता नहीं ,  समझना मुश्किल  था !!! बहुत ही complicated  feeling  थी पर थी, मगर  थी !

अजीब थी - ,  अल्हड सी , शोख भी ,  नहीं नहीं mature  सी - ओफो !!! पता नहीं क्या  !!
सच कहे तो समर को लगता - बहुत ही कॉम्प्लिकेटेड थी वो - बहुत उलझी  हुई या बहुत सुलझी  हुई  - कौन जाने ??
कई बार पता  नहीं क्यूँ बहुत  दुखी हो जाती और कभी इतनी खुश  !  कभी उजालो की गर्मी लिए हुए तो कभी घुप अँधेरे सी ,जर्द सी टूटी हुई !!
कभी फॉलो करती लोगो को और कभी यकायक बिना वजह bulk  में लोगो को unfollow  कर देती। बड़ी रहस्यमयी  सी  लगती थी।  दिखने में  तो  अच्छी ही थी !   और तो पता नही  - गोरी  थी,expressive  आँखे   और उसकी  मुस्कराहट अच्छी लगती  थी समर को !
समर खुद भी कुछ २००९ से था ट्विटर पर।  इस दौरान उसके खुद कई हज़ार  followers थे और कुछ एकाउंट्स वो खुद भी फॉलो करता था।

बस इसी दौरान साँझ को देखा और पढ़ा था समर ने।   न जाने क्या सोचकर समर ने फॉलो करना शुरू कर दिया था ।
selective  था समर लिखने में - फॉलो करने में।   सिर्फ नपा  तुला लिखा करता था।  कई बार दिन में सिर्फ टाइम लाइन पर चक्कर लगा आता था -  बिना कुछ लिखे।

साँझ की शायद आदत थी , वो अपने नए फोलोवर का अकाउंट चेक करती, उनके कुछ ट्वीट्स पढ़ती , उन्हें RT  करती और ये ज़रूरी नहीं था कि  वो फॉलो भी करती। बहुत मूडी सी जो थी।

खैर , समर ने जब फॉलो किया तो उसका भी अकाउंट चेक किया।  TL  पर आई , कुछ RT  किये। कुछ जो अच्छे लगे, उन पर कमैंट्स भी लिखे मगर फॉलो नहीं किया उसने समर को।
बस एक दिन जाने क्या हुआ साँझ को , क्या सूझी उसने समर को फॉलो करना शुरू किया। समर को अच्छा लगा।  मगर कुछ कहा नहीं समर ने  कभी DM  में या TL  पर। वह समर  के सभी  ट्वीट्स को like या RT  देती, कई बार कमेंट   भी करती ।

अचानक एक दिन समर को DM  कर पूछा था साँझ ने- "आप इतना अच्छा कैसे लिखते है?"   मुस्कुरा दिया था समर मैसेज  पढ़कर।  ये सवाल तो अक्सर लोग पूछते थे उससे, मगर आज साँझ ने पूछा था।
 साँझ ने लिखा था 
-"आप  सिखाएंगे मुझे ?"
-"मुझे तो साहित्य का 'स' भी नहीं आता !"
-" मैंने किसी  को पढ़ा भी नहीं !"
- "और तो और  patience  भी नहीं है पढ़ने का मुझमे !"
- "मुझे ग़ज़ल या कविता- किसी का भी व्याकरण नहीं आता "  -और  न जाने कितने  सारे सवाल एक ही बार में पूछ गई 'साँझ' !

"कितनी बातूनी होगी ये" समर सोच कर मुस्कुरा दिया था। जवाब में समर ने सिर्फ मुस्कुराने का इमोजी भेज दिया था।

फिर शुरू हो गई साँझ  -
-" आपकी  हिंदी भी बहुत अच्छी है,"
- "उर्दू के आपके लिखे आधे शब्द तो समझ ही नहीं आते मुझे  !"
 -"कितना अच्छा  लिखते है आप !"
- "और तो और मैंने आपकी TL  देखी  है।"
- "कितने सारे शायरों के कलाम याद है आपको!"
- "कैसे याद रखते है इतना कुछ ?"
- "मुझे तो कुछ याद भी  नहीं रहता   ....... "

उसके सवाल ख़त्म ही नहीं होते कभी ।  उसे जवाब शायद चाहिए भी नहीं होते थे। बीच बीच में मुस्कुराने के इमोजी भेज देता था समर।

और फिर वो खीज जाती  "आप तो कुछ कहते ही नहीं !! " उसके इस पागलपन पर हँस  पड़ता समर मन ही मन ।
 कभी ख़ास जवाब दिए नहीं समर ने उसे पलटकर मगर वो उससे जाने क्या क्या पूछती, कहती और उसकी  भेजी हुई इमोजी देख कर खीज कर चली जाती।
बस यही सिलसिला चलता रहता उसका।
समर अपने कामो में व्यस्त रहता - घर के, परिवार  के,  व्यवसाय के , बेटी को समय देने  की  वजह से  कई बार  ट्विटर पर नहीं जा पाता।
जब लौटता हफ्ते या दस दिन बाद तो डीएम में उलाहनाने भरे पड़े मिलते उसे साँझ के।

आदत के मुताबिक - कभी एक दो लाइन लिख कर या मुस्कुराकर चला जाता अपने TL  पर। कुछ शेर पोस्ट करता या motivational ट्वीट्स और बस  फिर अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाता था समर।

मगर जाने क्यूँ धीरे धीरे  साँझ समाने  लगी थी उसके वजूद में कहीं।  - नहीं!  वैसा कुछ भी नहीं था !!
आदत सी होने लग गई थी उसे साँझ की  बक बक की। .. उसके पागलपन की - शायद अच्छा लगता था उसकी कविताये - ग़ज़ल , पढ़ना , उसकी बेबाक बाते, कहाँ कहाँ  की , कैसी बाते - पेड़ पोधो की , अपने बचपन की , खेती ,की  उसकी आम चुराने के किस्से जो वो उसे DM  में सुनाती रहती। और यही पेड़ पक्षी , नदी, कभी खुश हो या कभी आंसू बन उसकी कविता , शायरी या ' sort  of  ग़ज़ल ' में झलक दिखा जाते  .....






और आज ?
आज सुबह  जब  TL  पर किसी को  'साँझ'  ने  wish करते हुए 'शुभ सुबह' कहा था - तो उस अकाउंट ने जवाब में लिखा था - "साँझ को शुक्रिया !"  और अपने स्वभाव के मुताबिक साँझ ने कहा था - "साँझ को  तो आना है और ढल जाना है, यही नियति है उसकी !"  फिर साँझ की   हँसी बिखर गई थी  उसकी  TL  पर। 

और फिर रात को समर ने पढ़ा   ट्विटर टाइम लाइन  पर, जहाँ उनके साझा दोस्तों  ने  लिखा था कि  साँझ की घर जाते वक़्त ट्रक से एक भयावह accident  में मौत हो गई।

आज सुबह कहा उसने  और  वाकई शाम को 'साँझ' ढल भी गई थी  !!

समर न जानता था उसे, न कभी मिला  था उससे, मगर  शायद उसकी रूह से बाते करता था समर।

सुन्न था समर - ' एक दर्द की साँझ वाकई ढल गई थी उसके भीतर भी ' !

यूँ तो बहुत following  है followers  है समर के।  उसका DM  खाली  तो नहीं रहेगा कभी,  ट्विटर टाइम लाइन   भी अपनी गति से सुगबुगाती रहेगी मगर  अब उसे 'साँझ' का  कोई DM  नहीं आएगा जिसमे  उसकी हिंदी , उर्दू की तारीफ़ होगी , अब कोई खेत, न खलिहान ,न आम चुराने की बात होगी!!!

 जाने क्यूँ कहीं भीतर ही समर के किसी दिन की कोई साँझ ढल गई थी शायद !!












 

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